Saturday, September 24, 2011

पत्थर

इतने संतुष्ट थे पत्थर
कि उनकी छाया ही नहीं थी
जो लाखों साल वे रहे थे समंदर के भीतर
यह भिगोए रखता था उनके सपनों को

गुनगुनी धूप थोड़ा और देर ठहरे
इस मामूली इच्छा के बीच
वे बस इतना चाहते हैं
कि कोई अभी उनसे बात न करे

Tuesday, November 30, 2010

मुझ

अपनी गैरत को हम अब और समझायेंगे नहीं
वफ़ा करते. हैं तो क्या. करते. हैं एहसाँ मुझपर

सरिफ आदमी

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..

दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..

दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..

साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..

वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..

तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..

ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..

मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..

बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा “अभी”..

हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं.

Monday, November 22, 2010

खामोश

आज


जबकि ये तय है

कि हमें बिछड़ जाना है

हमारे और तुम्हारे रास्ते

अलग अलग हो चुके हैं

तो

ये सोचना जरूरी है

कि हम गलत थे

या तुम?

मैं सोचता हूँ

और सोचता चला जाता हूँ...

कहीं मैं तो गलत नहीं था

शायद !

क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते

मुझे लगता है

मैं ही गलत था

मैं ये भी जानता हूँ

कि

तुम भी यही सोच रही हो

कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?

सच मानो-

रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों

पर

न मैं गलत था

और न ही तुम।

फिर ये जुदाई क्यों?

ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है

मेरे जेहन में .

मैं सोचने लगता हूँ...

जमीं आसमां नहीं मिलते

( विज्ञान में यही पढ़ा है

पर विज्ञान कुछ भी कहे )

जमीं आसमां मिलते हैं

एक छोर से मिलते हुए

वे जुदा होते हैं

और

फिर मिल जाते हैं

सच्चाई यही है कि

चारो दिशाओं में

वे एक हैं.

बीच में हम जैसे लोग हैं

जो ये समझते हैं कि

जमीं आसमां एक नहीं हैं.

करोड़ों तारों की तपिश

अपने कलेजे में रखने वाला आसमां

और

अरबों लातों की मार सहने वाली धरती

एक हैं।

फिर हम तुम जुदा कैसे?

हम मिलकर चले थे,

आज जुदा हैं..

पर आगे फिर मिलेंगे।

हाँ !

उसके बाद जुदाई नहीं होगी

क्योंकि

जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है

उतना ही शायद मैंने भी।

और दर्द सीने में दबाये रखने वाले

एक होकर रहते हैं

वो भी ऐसे

जैसे दूर क्षितिज पर

जमीं और आसमां

जहाँ से वे अलग नहीं होते।

मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा

और न ही मिलने को कहूँगा

पर हम फिर मिलेंगे

उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।

हाँ !

ये मिलन खामोश होगा

क्योंकि

जिनके कलेजे में दर्द होता है

उनकी जुबां नहीं हिलती

बिलकुल मेरी तरह....

बिलकुल तुम्हारी तरह.....

Sunday, November 21, 2010

मुस्कराना

झुकी नज़रों से उनका मुस्कराना जुल्म ढाता है

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



हँसीना जो मिली थी आज मुझको एक अनजानी

उसी की एक चितवन के लिए दिल डोल जाता है



बयाँ कैसे करूँ, जाती नहीं सूरत निगाहों से

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



छिपाए जा रही थी चाँद सा मुखड़ा उरोजों में

नवेली व्याहता का ज्यूँ कोई घूंघट उठाता है



खुदा भी है बड़ा माहिर, बना दीं सूरतें ऐसी

जिन्हें गर देख लो इक बार तो ईमान जाता है



चलो अच्छा हुआ, देखा उसे मैंने फकीरी में

नहीं तो इश्क, पहचाने बिना फाँका कराता है

सिन्दूर

भरते क्यूँ नहीं सिन्दूर अपने नाम का बढ़ केतुम्हारे. आस. पास. घूमती खुशियाँ कुँवारी हैं

नूर

उसे जब भी मैं देखूँ मुस्कराते दूसरों के बीचजी करता कि बढ़ के पोंछ दूँ सब नूर चेहरे का