Sunday, November 21, 2010

मुस्कराना

झुकी नज़रों से उनका मुस्कराना जुल्म ढाता है

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



हँसीना जो मिली थी आज मुझको एक अनजानी

उसी की एक चितवन के लिए दिल डोल जाता है



बयाँ कैसे करूँ, जाती नहीं सूरत निगाहों से

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



छिपाए जा रही थी चाँद सा मुखड़ा उरोजों में

नवेली व्याहता का ज्यूँ कोई घूंघट उठाता है



खुदा भी है बड़ा माहिर, बना दीं सूरतें ऐसी

जिन्हें गर देख लो इक बार तो ईमान जाता है



चलो अच्छा हुआ, देखा उसे मैंने फकीरी में

नहीं तो इश्क, पहचाने बिना फाँका कराता है

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