Friday, September 10, 2010

आओ कहीं आग लगाये

आओ व्यर्थ विवाद खड़ा करे
एक दूजे का सर फोड़े
प्यार मोहब्बत भाड़ में जाये

आओ कुत्तो सा चीखे चिल्लाये
...एक दूजे को काट खाए
नोचे दबोचे गुत्थम-गुत्था हो जाये

आओ कहीं आग लगाये
एक दूजे का घर जलाये
उसी आग में स्वहः हो जाये

मैं

तुम हवा थी,
ठीक थी

तूफान बनने की

...क्या ज़रूरत थी ?

मैं तिनका था,
तुच्छ था

वैसे भी उड़ जाता

Sunday, September 5, 2010

दो शब्द 25

इक रोज़ खुदा ने
इंद्रधनुष के रंगो को
एक शीशी में बंद किया...
उस शीशी को
हल्का हिला के
एक कैनवस पे
उड़ेल दिया..
उस कैनवस पे
मेरी तस्वीर उभरी थी...

वो तस्वीर बना के
'खुदा' सोने को गये
फ़रिश्तो ने,शाम ढले
उसपे कुछ..ख़ुश्बू डाली..
ढलते सूरज की
रोशनी छिड़की...
....
आधी रात में
शैतान ने
वो तस्वीर चुरा ली...
...पर वो तो
आम सी तस्वीर दिखती थी
..
अब चुरा ली
तो क्या करता..
दो रोज़
अपने पास रखी,
फिर उभ के
मिट्टी में
दफ़ना दी..
सदियों-सदियों
वो दफ़न रही...
एक रोज़
फ़रिस्ते मिट्टी में
खेल रहे थे..
उनको वो तस्वीर मिली
...अपनी ग़लती छुपाने
फ़रिस्तों ने
जल्दी-जल्दी
आडी-तिरछी सी
किस्मत लिख..
मुझको धरती पर
फेक दिया...

मैं तबसे
धरती पर हूँ
उन रंगो की
तलाश में हूँ...

कुछ रंग मिले है
कुछ ख़ुश्बू भी...
आप "फ़ुरसत" मे है
तब ही आए..
समझे मैं कौन हूँ...
क्या-क्या ख़ुद में
समेटे हूँ..

मैं कौन हूँ..?
अब तक तलाश ये जारी है...

दो शब्द24

नजरें मिलती हैं पर नजारे नहीं मिलते।
बेसहारों को कहीं सहारे नहीं मिलते।
जिंदगी इक नदी है, तैरते ही जाइए,
डूबते इंसान को किनारे नहीं मिलते।'

Friday, September 3, 2010

सवाल

वर्षों पहले
बच्चे ने देखी थी दुनियाँ

अब बच्चा उसका
आँगन में
गर्मियों की तमाम रातें
माँ का आँचल छोड़
पिता के साथ

तारों की कहानियाँ
उड़न-खटोले की सैर
आकाशगंगा
चाँद की शीतलता
महसूस करता है

बच्चे की एक उलझन है
हमारा घर बड़ा या तारा
ताखे पर जलता जो दीया है
बड़ा है तारे से

पिता झुंझलाता
फिर दूसरी बातों में बच्चे को भटकाता
उसके मन में भी यही सवाल

जब वह नन्हा था
उसके पिता ने नहीं बताया
सुनाया था गाना
चंदा मामा दूर के
पुए पकाए गुड़ के

सुबह-सबेरे पैना और खाना लिए
जाते हुए खेत
बच्चा सवालों की झड़ी लगाया
पिता फिर झुंझलाया

मुझे नहीं मालूम
इन खेतों का पानी
सूख क्यूँ गया
दरारें क्यूँ पड़ जाती हैं
खेतों में
[पैरों में भी]
आम के इस पेड़ में
क्यूँ नहीं आये मोजर
चार सालों से
हवा कभी पूरब कभी पश्चिम से
क्यूँ आती है

और अंत में
जो बच्चे ने नहीं पूछा
सवाल वह
पिता के कलेजे पर उग आया

अन्न उगा
कभी किसी रात को
भूखे क्यूँ सो जाती
मुन्ने की माँ

Thursday, September 2, 2010

दो शब्द 23

ऐसी ही होती है मृत्यु
जैसे उतरता है नशा

ऐसा ही होता है जीवन
जैसे चढती है शराब...

दुपट्टा

वह रंग
जो भरा था सबने मिलकर
एक सुनहले कटोरे में

जिसकी कुछ बूंदों से
रंगीन होनी थी दुनियां

सोचा था
माटी से सने मुख
धान रोपते हुए
खुशी के गीत गायेंगे

खदानों की कालिख से
काला हुआ चेहरा
दमकेगा
मिल और कारखाने
सोना उगलेंगे
धरती खुशहाल होगी

फिर अचानक
कुछ लोगों ने
लगा लिया अपने दामन पर
कटोरे में भरा वह रंग
इतना भी न छोड़ा
जिसमे डुबो सकें
एक रेशमी दुपट्टा

कहा जरूर भरेंगे वापस
परचम लहरायेंगे

इंतजार में खो रहे अब
वे चहरे
जिसे खदान ने रंग दिया था
वो हाथ
जो मिट्टी से सने थे

पथरा रही है आँखें
राहें देख-देख
कब भरेगा वो कटोरा फिर से

लहराएगा उस रंग में डूबा
वो रेशमी दुपट्टा
प्राचीर पर

Wednesday, September 1, 2010

दो शब्द23

पूजा आडम्बर नहीं मन को शुद्ध करने की प्रक्रिया है जो अपने आपको शुद्ध प्रमाणित करने की आवश्यकता समझते हैं , वे तरह –तरह के आडम्बरों में पड़ते हैं ।