Tuesday, November 30, 2010

मुझ

अपनी गैरत को हम अब और समझायेंगे नहीं
वफ़ा करते. हैं तो क्या. करते. हैं एहसाँ मुझपर

सरिफ आदमी

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..

दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..

दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..

साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..

वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..

तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..

ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..

मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..

बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा “अभी”..

हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं.

Monday, November 22, 2010

खामोश

आज


जबकि ये तय है

कि हमें बिछड़ जाना है

हमारे और तुम्हारे रास्ते

अलग अलग हो चुके हैं

तो

ये सोचना जरूरी है

कि हम गलत थे

या तुम?

मैं सोचता हूँ

और सोचता चला जाता हूँ...

कहीं मैं तो गलत नहीं था

शायद !

क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते

मुझे लगता है

मैं ही गलत था

मैं ये भी जानता हूँ

कि

तुम भी यही सोच रही हो

कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?

सच मानो-

रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों

पर

न मैं गलत था

और न ही तुम।

फिर ये जुदाई क्यों?

ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है

मेरे जेहन में .

मैं सोचने लगता हूँ...

जमीं आसमां नहीं मिलते

( विज्ञान में यही पढ़ा है

पर विज्ञान कुछ भी कहे )

जमीं आसमां मिलते हैं

एक छोर से मिलते हुए

वे जुदा होते हैं

और

फिर मिल जाते हैं

सच्चाई यही है कि

चारो दिशाओं में

वे एक हैं.

बीच में हम जैसे लोग हैं

जो ये समझते हैं कि

जमीं आसमां एक नहीं हैं.

करोड़ों तारों की तपिश

अपने कलेजे में रखने वाला आसमां

और

अरबों लातों की मार सहने वाली धरती

एक हैं।

फिर हम तुम जुदा कैसे?

हम मिलकर चले थे,

आज जुदा हैं..

पर आगे फिर मिलेंगे।

हाँ !

उसके बाद जुदाई नहीं होगी

क्योंकि

जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है

उतना ही शायद मैंने भी।

और दर्द सीने में दबाये रखने वाले

एक होकर रहते हैं

वो भी ऐसे

जैसे दूर क्षितिज पर

जमीं और आसमां

जहाँ से वे अलग नहीं होते।

मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा

और न ही मिलने को कहूँगा

पर हम फिर मिलेंगे

उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।

हाँ !

ये मिलन खामोश होगा

क्योंकि

जिनके कलेजे में दर्द होता है

उनकी जुबां नहीं हिलती

बिलकुल मेरी तरह....

बिलकुल तुम्हारी तरह.....

Sunday, November 21, 2010

मुस्कराना

झुकी नज़रों से उनका मुस्कराना जुल्म ढाता है

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



हँसीना जो मिली थी आज मुझको एक अनजानी

उसी की एक चितवन के लिए दिल डोल जाता है



बयाँ कैसे करूँ, जाती नहीं सूरत निगाहों से

हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है



छिपाए जा रही थी चाँद सा मुखड़ा उरोजों में

नवेली व्याहता का ज्यूँ कोई घूंघट उठाता है



खुदा भी है बड़ा माहिर, बना दीं सूरतें ऐसी

जिन्हें गर देख लो इक बार तो ईमान जाता है



चलो अच्छा हुआ, देखा उसे मैंने फकीरी में

नहीं तो इश्क, पहचाने बिना फाँका कराता है

सिन्दूर

भरते क्यूँ नहीं सिन्दूर अपने नाम का बढ़ केतुम्हारे. आस. पास. घूमती खुशियाँ कुँवारी हैं

नूर

उसे जब भी मैं देखूँ मुस्कराते दूसरों के बीचजी करता कि बढ़ के पोंछ दूँ सब नूर चेहरे का

Saturday, November 20, 2010

दो सब्द्३०

आप के खिताब से नवाज़ा क्या तुमने
तल्खी मिजाज़ की हम महसूस कर गए
तुम से आप का सफ़र कितना थकाता है
हम बोल भी न पाए जहाँ थे ठहर गए




गर्दिश में हों सितारे तो होता है यही हाल
राह दिखलाने को अंधा भी नहीं मिलता
अपनों के साथ हँसना तो होता ही है मुहाल
रोने के लिए एक कंधा भी नहीं मिलता




देखता हूँ तो झूठे गुस्से का इज़हार करती हो
नहीं देखूँ तो रुक के मेरा इंतज़ार करती हो
आ के खिड़की पे ही क्यूँ बाल खोलती हो तुम
बिना मुह खोले कितना झूठ बोलती हो तुम




आँसू उनके पोंछो जिनको हँसना आता हो
उसे सुनाओ गीत कभी जो खुद भी गाता हो
नीरस तो मरता रहता है जीना क्या जाने
जियो उसी के साथ जिसे खुद जीना आता हो




पहचान तो लूँगा उन्हें, हों कैसे भी हालात
एक दौर था जब उनके ही पहलू में रहते थे
साथ में गर जीने न पाए तो क्या हुआ
हम साथ साथ मरने की बातें तो करते थे



इक दौर था, इक दूसरे का प्यार मिलता था
हँसते थे साथ साथ तो मिलती थी हर खुशी
अब दौर, कि मरना भी मुश्किल एक दूजे पर
मुमकिन नहीं है, छीन लें एक दूजे कि हँसी




हिन्दू हमी पठान मुसलमान हैं हम सब
पंडित हमी औ तालिब-ए-कुरान हैं हम सब
दुआ करें मंदिर में या सजदा मजार पे
वो एक ही है जिसके तलबगार हैं हम सब

Thursday, November 18, 2010

दूरी

मेरे हर इलज़ाम को चुप चाप वो सहती गयी
मुझको माफ़ी दे के वो तो खुद खुदा होती गयी

दूरी अपने दर्मियाँ कुछ इस तरह बढ़ती गयी
रूह मेरी, किश्तों में मुझसे जुदा होती गयी

बंद कर दे मुझपे अपनी आजमाइश ऐ खुदा
मैं तेरे हर इम्तेहाँ में अब तलक अव्वल रहा

खामोशियों की भी जुबान होती है
किसी किसी को ही पहचान होती है

मैं देखता रहा उन्हें पलकों की ओट से
वो मुस्करा दिए तो मेरा हौसला बढ़ा

दर्दे दिल अब बढ़ चुका है हद से भी ज्यादा
इसका धडकना बंद हो तो कुछ सुकून मिले

आती तो है खुशी मेरे चेहरे पे भी मगर
जाती है ज्यूँ मजार से चादर उतार ली

कहाँ छुपा रखा था मासूमियत को अपनी
हम बेवजह फिरते रहे जाने कहाँ कहाँ

तुमसे किया था वादा कि लब न खोलूँगा
वरना तो हर बात का जवाब है, कहो तो दूं

ये मेरी बेहयाई है कि उनकी हद-ए-वफ़ा है
मुझे दीदार कराने को हो जाते हैं बेनकाब

रास्ते बदलते रहना मेरी फितरत में नहीं है
हम तो मंजिल को ही निसाना बना के चलते हैं

खामोशियों को सुनता हूँ, मुझमे है ये हुनर
अँधेरे देख सकता हो तो आ गले लग जा

तुम झूट मेरे बारे में कहना जो कर दो बंद
वादा है सच तुम्हारा किसी से न कहूँगा

बारिश में एक बूँद को तरसता हूँ मैं
धूप पे बनके पसीना बरसता हूँ मैं

चलो करते हैं कोशिश कब तलक खुद को सतायेंगे
उन्ही कि याद में हम रोते रोते सो ही जायेंगे

मेरा ज़मीर मनाने नहीं देता ख़ुशी दिल को
सुना है रहबर-ए-रक़ीब ही नाबीना हो गया

इसे गुरूर मत समझो ये मेरा ऐतबार है
अगर मैं रात को दिन कह दूं तो सूरज निकल आये

अँधेरे में ही गुजरी हो सारी जिन्दगी जिसकी
रौशनी में तो उसकी आँखें चौंधिया ही जायेंगी

ऐसी तरकीब कोई दोस्त बताये मुझको
नींद भर सो लूँ कोई खाब न आये मुझको

आप रहते हो जहाँ, मेरी इबादतगाह है
अब वो मंदिर है कि मस्जिद किसको ये परवाह है

एक खता कभी कभी काबिले दाद होती है
आदम सेब खाता है दुनियाँ आबाद होती है

बुझा सा दिखता है पर एक फूँक मार कर तो देख
राख के नीचे अभी भी सुर्ख अंगार जिन्दा है


मुझे नाकामी का एहसास भी होने नहीं देते
मेरे सपने ही मुझको चैन से सोने नहीं देते

Wednesday, November 17, 2010

प्रयोग

क्यों न हम
भौतिकी का एक प्रयोग करें
लोहे को
चुम्बक से रगड़ो
उसमें आ जाता है
चुम्बकीय गुण ...//

हम भी बन जायेगे
चुम्बक
गर चलेगें
महापुरुषों द्वारा बनाई
पदचिन्हों पर ....//

Tuesday, November 16, 2010

गम

गम का खज़ाना तेरा भी है मेरा भी ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी अपने गम का गीत बन कर गा लेना राग पुराना तेरा भी है मेरा भी तू मुझको और मैं तुमको समझाऊँ क्या ...:दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी

याद

याद कर के किसी को हम कितना रोये हैं
इस. बात. की. तो याद भी रुलाने लगी है

Monday, November 15, 2010

दो ख़बरें

दो ख़बरें

दो आत्महत्याएँ

एक बिकती रही रात भर

टीवी चैनल्स पर

और फिर सुबह को

परोसी गई

एक मिक्सड डिश के रूप में

अखबारों केपन्नों पर

सुसाइड या हादसा?





करते रहो बहस....

एक असफल प्रेमी

और रईसजादे की मौत को

घरो से बसों,

और फिर दफ़्तरों तक ले जाते लोग

अखबार के कोने में छपी

एक खबर को लांघ कर निकल गये

जिसका बोर सा शीर्षक था

लू लगने से एक रिक्शेवाले की मौत......



पर उसकी पत्नी ही जानती थी

वो एक हादसा नहीं

आत्महत्या थी

आखिर क्यों निकला था

तपती धूप में पेट की आग बुझाने?

Sunday, November 14, 2010

तुम

दूर रहके ही मुस्कराओगे

या करीब मेरे तुम आओगे


...
फिक्र अपनी नहीं तुम्हारी है

कैसे तुम जिंदगी बिताओगे



जागती आँखों में सोये कोई

नीद में मुझको ही सुलाओगे



मुझको भुलाना है नहीं आसाँ

कैसे इस बात को भुलाओगे



मिरी पुतली जो पलट जायेगी

बारहा मुझको तुम बुलाओगे



करोगे अपने से धोखा कबतक

हकीकत कब तक यूँ छुपाओगे



आ जाओ, तुम जीते मैं हारा

अब तो खुश हो गले लगाओगे

दोस्ती

कोई भी दोस्त गर नाराज रहे, मुझसे बर्दाश्त क्यूँ नहीं होता
दोस्ती तो हसीं नियामत है, उसको आभास क्यूँ नहीं होता

आज इस स्वार्थ भरी दुनियाँ में, मैं जिंदा हूँ दोस्तों के लिए
दोस्त गर होते नहीं साथ मेरे, मैं दुनियाँ में यूँ नहीं होता

भूल पाता नहीं मैं वो दिन जब अपनों ने भी साथ था छोड़ा
दोस्तों ने संभाला न होता, ज़ीश्त ये बाखुशबू नहीं होता

मेरे बच्चे अनाथ हो जाते, मेरी बीबी भी हो जाती बेवा
दोस्त गर ऐन वक़्त न आते, घर मेरा पुरसुकूं नहीं होता

आज बस इतना ही कहता हूँ, कि दोस्ती सच्ची इबादत है
दोस्तों के बिना इबादत क्या, मेरे हाथों वजू नहीं होता

पत्थर

सुना है अब की पत्थरों ने बगावत कर दी
फेंकने वालों के गुरूर पे लानत कर दी
लौट के फोड़ दिया सर फिरकापरस्ती का
अमन-ओ-ईमान से रहने की हिदायत कर दी

Saturday, November 13, 2010

सब्र तो करो

यूँ रोते नही शामो –सहर , सब्र तो करो
कहती है अभी राहगुज़र सब्र तो करो

दुनिया जो मुक़ाबिल है कहो पूजने लगे
ऐ मेरे जवाँ ज़ख्मे-जिगर सब्र तो करो

धरती में निहाँ सोज़ कोई अब्र बन गया
जब दिल का धुआँ जाये ठहर सब्र तो करो

छालों के कई दाग दिये खैरख्वाह ने
चमकेंगे यही दाग़ मगर सब्र तो करो

जो धूप बिखेरे है वही बख़्श दे कभी
ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव बशर सब्र तो करो

आती है उसे शर्म मिरे साथ आज, पर
कल खुद पे लजायेगी नज़र सब्र तो करो

इक रोज़ मुहब्बत का उसे भी लगेगा रोग
जायेंगे तिरे भाग सँवर सब्र तो करो

इस वज़्ह तुम्हें ज़ख्म दिये जा रहे है, वो
मरहम भी लगायेंगे, मगर सब्र तो करो

मंज़िल के लिये शहर में घूमो न दरबदर
आयेगी वो ज़ीने से उतर सब्र तो करो

आयी न वफ़ा रास हबीबों को “शेष” की
हमराह हैं खुर्शीदो-क़मर सब्र तो करो
ग़ज़ल



देख के मुझको, गुस्से से तिलमिलाया क्यूँ
अपने ज़ज्बातों को, चेहरे पे वो, लाया क्यूँ

खयालो में वो, मुझसे ही लड़ रहा होगा
सामने मैं हूँ, ये इमकान न रहा होगा

मानता हूँ की मुद्दतों से ऐसा हाल न था
दर्मियाँ अपने, जब कोई भी सवाल न था


हम तो उसकी मिजाज़-पुर्सी को आये थे
जिसने मेरे लिए आंसू कभी बहाए थे
बिरही
मुझे सताए सजना, जाए प्रीत निगोड़ी जाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

तेरो अंग लगूँ तो लागे हर दिन मोको फाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चले गए परदेस सजनवा, फूट्यो मेरो भाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चाँद सुलगता लागे मोहे, फूल दहकती आग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

हार गले का, पाँव पैजनी लिपटें जैसे नाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

बिन तेरे माथे कि बिंदिया, लगे जले का दाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चाहे कितना सज लूँ साजन, सूनी रहती माँग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

उम्मीद

हो जैसा भी नसीब मगर दिन तो कटेगा ही

भूख मिटाने को मुफलिस दिन रात खटेगा ही



ओ चश्मेतर, मुश्किल नहीं है मंजिले-हयात

कदम तो बढ़ाते रहो, रस्ता ये कटेगा ही



हमने भी देख लिया है वाइज का मोजीजा

होगी जो रूह रोशन तो अँधेरा छंटेगा ही



तुम कदम तो बढाओ, कुछ हौसला दिखाओ

तजाहुल है, मगर मुश्किल में साथ डटेगा ही



देगा वो मांगने से ही, बनना न खरीदार

मौला बड़ा ताजिर है वो तुझको जटेगा ही



जिससे भी मिलना सोचके समझ के ही मिलना

कांटो से दोस्ती में दामन तो फटेगा ही



भूल जा तू दुश्मनी सबको लगाता जा गले

गम

गम ही देना है तो सब दो, औरों के हिस्से न आये
देख. के. दुश्मन. भी. रोये, चैन. से वो सो न पाये

चेहरा

कोई भी चेहरा धुंधला सा दिखे, अच्छा नहीं लगता
इस लिए आईने को हर समय चमका के रखते हैं

दुश्मन

दुश्मन ही सही लेकिन तू फिर भी मेरा है
अजनबी कोई दोस्त या दुश्मन नहीं बनता

किस्सा

एक जमाना था जब तुम पर नाज़ बहुत मै करता था
आज मुझे किस्सा लगती हो तुम मेरी नादानी का

Friday, November 12, 2010

दो शब्द २9

पति वह है जो प्रेमी के सारे स्नायु निचुड़ जाने के बाद बचा रह जाता है।

दो शब्द २8

इतनी मोहब्बत है मेरे दिल में आपके लिये
कि यह कभी कम न हो पायेगी
जिस दिन जायेंगे इस दुनिया से
उस दिन मौत भी आंसूं बहायेगी

दो शब्द २७

मैंने कई बार चांद की लौ में उसे देखा है, किसी टहनी पर उगने वाले पहले पत्ते में नदी के पानी में तैरते हुए मन्दिर के कलश में... अगर वह सचमुच मर गया होता—तो मेरी आँखों में यह पानी नहीं आ सकता था...

दो शब्द २६

भूल जाना उसे भुला देना याद तक उसकी दफना देना

Friday, September 10, 2010

आओ कहीं आग लगाये

आओ व्यर्थ विवाद खड़ा करे
एक दूजे का सर फोड़े
प्यार मोहब्बत भाड़ में जाये

आओ कुत्तो सा चीखे चिल्लाये
...एक दूजे को काट खाए
नोचे दबोचे गुत्थम-गुत्था हो जाये

आओ कहीं आग लगाये
एक दूजे का घर जलाये
उसी आग में स्वहः हो जाये

मैं

तुम हवा थी,
ठीक थी

तूफान बनने की

...क्या ज़रूरत थी ?

मैं तिनका था,
तुच्छ था

वैसे भी उड़ जाता

Sunday, September 5, 2010

दो शब्द 25

इक रोज़ खुदा ने
इंद्रधनुष के रंगो को
एक शीशी में बंद किया...
उस शीशी को
हल्का हिला के
एक कैनवस पे
उड़ेल दिया..
उस कैनवस पे
मेरी तस्वीर उभरी थी...

वो तस्वीर बना के
'खुदा' सोने को गये
फ़रिश्तो ने,शाम ढले
उसपे कुछ..ख़ुश्बू डाली..
ढलते सूरज की
रोशनी छिड़की...
....
आधी रात में
शैतान ने
वो तस्वीर चुरा ली...
...पर वो तो
आम सी तस्वीर दिखती थी
..
अब चुरा ली
तो क्या करता..
दो रोज़
अपने पास रखी,
फिर उभ के
मिट्टी में
दफ़ना दी..
सदियों-सदियों
वो दफ़न रही...
एक रोज़
फ़रिस्ते मिट्टी में
खेल रहे थे..
उनको वो तस्वीर मिली
...अपनी ग़लती छुपाने
फ़रिस्तों ने
जल्दी-जल्दी
आडी-तिरछी सी
किस्मत लिख..
मुझको धरती पर
फेक दिया...

मैं तबसे
धरती पर हूँ
उन रंगो की
तलाश में हूँ...

कुछ रंग मिले है
कुछ ख़ुश्बू भी...
आप "फ़ुरसत" मे है
तब ही आए..
समझे मैं कौन हूँ...
क्या-क्या ख़ुद में
समेटे हूँ..

मैं कौन हूँ..?
अब तक तलाश ये जारी है...

दो शब्द24

नजरें मिलती हैं पर नजारे नहीं मिलते।
बेसहारों को कहीं सहारे नहीं मिलते।
जिंदगी इक नदी है, तैरते ही जाइए,
डूबते इंसान को किनारे नहीं मिलते।'

Friday, September 3, 2010

सवाल

वर्षों पहले
बच्चे ने देखी थी दुनियाँ

अब बच्चा उसका
आँगन में
गर्मियों की तमाम रातें
माँ का आँचल छोड़
पिता के साथ

तारों की कहानियाँ
उड़न-खटोले की सैर
आकाशगंगा
चाँद की शीतलता
महसूस करता है

बच्चे की एक उलझन है
हमारा घर बड़ा या तारा
ताखे पर जलता जो दीया है
बड़ा है तारे से

पिता झुंझलाता
फिर दूसरी बातों में बच्चे को भटकाता
उसके मन में भी यही सवाल

जब वह नन्हा था
उसके पिता ने नहीं बताया
सुनाया था गाना
चंदा मामा दूर के
पुए पकाए गुड़ के

सुबह-सबेरे पैना और खाना लिए
जाते हुए खेत
बच्चा सवालों की झड़ी लगाया
पिता फिर झुंझलाया

मुझे नहीं मालूम
इन खेतों का पानी
सूख क्यूँ गया
दरारें क्यूँ पड़ जाती हैं
खेतों में
[पैरों में भी]
आम के इस पेड़ में
क्यूँ नहीं आये मोजर
चार सालों से
हवा कभी पूरब कभी पश्चिम से
क्यूँ आती है

और अंत में
जो बच्चे ने नहीं पूछा
सवाल वह
पिता के कलेजे पर उग आया

अन्न उगा
कभी किसी रात को
भूखे क्यूँ सो जाती
मुन्ने की माँ

Thursday, September 2, 2010

दो शब्द 23

ऐसी ही होती है मृत्यु
जैसे उतरता है नशा

ऐसा ही होता है जीवन
जैसे चढती है शराब...

दुपट्टा

वह रंग
जो भरा था सबने मिलकर
एक सुनहले कटोरे में

जिसकी कुछ बूंदों से
रंगीन होनी थी दुनियां

सोचा था
माटी से सने मुख
धान रोपते हुए
खुशी के गीत गायेंगे

खदानों की कालिख से
काला हुआ चेहरा
दमकेगा
मिल और कारखाने
सोना उगलेंगे
धरती खुशहाल होगी

फिर अचानक
कुछ लोगों ने
लगा लिया अपने दामन पर
कटोरे में भरा वह रंग
इतना भी न छोड़ा
जिसमे डुबो सकें
एक रेशमी दुपट्टा

कहा जरूर भरेंगे वापस
परचम लहरायेंगे

इंतजार में खो रहे अब
वे चहरे
जिसे खदान ने रंग दिया था
वो हाथ
जो मिट्टी से सने थे

पथरा रही है आँखें
राहें देख-देख
कब भरेगा वो कटोरा फिर से

लहराएगा उस रंग में डूबा
वो रेशमी दुपट्टा
प्राचीर पर

Wednesday, September 1, 2010

दो शब्द23

पूजा आडम्बर नहीं मन को शुद्ध करने की प्रक्रिया है जो अपने आपको शुद्ध प्रमाणित करने की आवश्यकता समझते हैं , वे तरह –तरह के आडम्बरों में पड़ते हैं ।

Tuesday, August 31, 2010

दो शब्द 22

इश्क का धुंआ अगर शादी के बाद उठे तो दमकल बनी बीवी पूरे शहर का पानी इश्किये पर छिड़क डालती है...

दो शब्द21

अगल बगल बैठी लड़की और घरेलु महिला के दिमाग में मछली ही घूमती है, एक फंसाने के लिए, और एक खाने के लिए...

मंदिर और मदिरालय

मंदिर और मदिरालय में है कौन बेहतर



ये सवाल एक छोटे बच्चे से पूछा ।



उससे,जो एक शराबखाने के बाहर,



बेचता है बर्फ हर शाम ।



कमर से बांधे रखता है प्लास्टिक का ग्लास



हाथों में एक मग और माचिस ।



पांच रूपये में रच देता है,जो



बार,खुले आसमां के नीचे ।



इसके बदले उसे मिलता है



चंद पैसे और शराब की खाली बोतलें



मुनाफे का सौदा है ये ।



ये जगह मुफिद है उसके लिये



धूल भरी गर्म शामों में भी ।



पर उसे बहुत मतलब नहीं



पास एक मंदिर से ।



उसे बस इतना मालूम है



कि,भगवान रहते हैं यहां ।



हजारों लोग आते हैं,



कुछ ना कुछ मांगने,



नई गाड़ी की पूजा कराने,



तो अच्छी नौकरी मांगने,



लेकिन इससे उसे क्या



रोटी तो नहीं मिल पाती यहां ।



प्रसाद भी लोग बड़ी दुकानों से खरीद लाते हैं



फूल बेचने के लायक पूंजी नहीं उसके पास ।



मंदिर से मिले प्रसाद के बाद भी,



भूख लगी रहती है उसे ।



लिहाजा मदिरालय ही,



बेहतर है उसके लिये ।



यहां वो शान से रहता है



क्योंकि उसे किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता ।

दस क्षणिकाएँ

वार

पीठ पीछे का वार

तोड़ देता है

परिवार





जीवन मंथन

मुमकिन है गोते लगाना

मुश्किल है सीप से मोती लाना

ये जीवन मंथन है





दौर

जो दौर गुजर रहा है

हमारे आसपास से

डरने लगे हैं

अपने अहसास से





भ्रष्टाचार

कलियुग में भ्रष्टाचार

खड़ा है बाँह फैलाए

जीवन का यह चक्र

फिर भी घूमता जाए





शून्य

धीरे धीरे बारी बारी

रूठे मुझसे सब

शून्य को निहारता हूँ

रोता नहीं हूँ अब





कोशिश

एक टुकड़ा धूप ही सही

कभी तो मिलेगी

कोशिश करना ही जिंदगी है



कदम

आगे कुआँ पीछे खाई है

यहाँ किसने निभाई है

संभल कर रखो कदम

इसी में भलाई है





हिम्मत

काले घुप्प अंधेरे में

रौशनी की एक नन्हीं लकीर

देती है अँधियारा चीर

हिम्मत से





ग़ज़ल

आहों वेदनाओं से जब

नयन हुए सजल

कभी गीत कभी मुखड़ा

कभी बन गई गजल



१०

सत्कर्म

जिंदगी एक फूल है

जो महकती है

चहकती है

अपने सत्कर्मों से

दो शब्द19

पराई औरत और पराया मर्द कभी भी आपके घर में सेंध तो लगा देते हैं पर बच्चों की एक किलकारी मात्र उन्हे बाहर का रास्ता दिखा देती है

दो शब्द18

हर मुनि को एक मेनका जरूर मिलती है पर हर मेनका को मुनि नहीं.....

दो शब्द 17

चरित्र अगर किलो के भाव बिकता तो उसका वितरक आज विश्व का सबसे धनवान व्यक्ति होता....

दो शब्द 16

पुरस्कृत शराबियों के पास
बचे हैं सिर्फ पीतल के तमगे
उपेक्षित शराबियों के पास
अभी भी बची है
थोडी सी शराब.....

Sunday, August 29, 2010

दो शब्द16

अरबपति से अमीर विश्व भ्रमण किया हुआ यात्री, उस यात्री से अमीर एक चंडाल, उस चंडाल से अमीर एक वेश्या होती है....

दो शब्द15

तेरी याद खटमल सी चुपके से काट जाती है
कभी मच्छर बनी कानो में पास आ भुनभुनाती है
कछुवा छाप अगरबत्ती रुपी, दारु भी कुछ न कर पाती है
मुई शाम को चढ़ती है, और सुबह सेंसेक्स सी उतर जाती है
कभी पड़ोसन के बालों, तो कभी भजियावाले के टिंडे देख सताती है
अब तो तू मुझे कालोनी की कुतिया में भी नज़र आती है
ढाई अक्षर प्रेम का, साला अढाई लाख का बिल ले आया
अपने सारे बॉय फ्रेन्डों के रीचार्ज कूपनों का
कमीनी तुने मुझसे ही बिल भरवाया
हाय रे दैया, तुने मुझे ये क्या दिन दिखलाया
सेकंड हैण्ड मारूति कार से, तेरा इश्क मुझे साइकल पर ले आया
अब तूने सिम कार्ड ही नहीं, हैंडसेट तक बदल डाला
मुझ बनवारी लाल को छोड़, तूने बाबु धाकड़ से नाता जोड़ डाला
मेरा नेटवर्क जाम कर, तू तो एस .एम्म .एस सी फुर्र हुई
मेरी मज्नुई आशिकी तुझ फूलन देवी के आगे थक कर चूर हुई
पर मैं भी छोरा यू पी का, घुटने न टेक पाऊंगा
तेरे छिछोरे हैंडसेट से बढ़िया, एक और नई पटाउँगा
एस एम् एस गया भाड़ में , ईमेल से काम चलाऊंगा
बनवारी लाल से नाम बदल मैं भी "बैनी" बन जाऊंगा
सैकंड हैण्ड मारूति की जगह अब "नैनो" खरीद ले आऊंगा
और तुझे और तेरे धाकड़ को गज भर लम्बी जीभ दिखा चिढाऊंगा

दो शब्द 14

परमात्मा ने औरत बनाते समय शराब पी ली होगी, तभी वो ऊँची एड़ी वाले सैंडल पहन शराबियों सी चलती है, बहुत ज्यादा बोलती है, हर वक़्त सरदर्द की शिकायत करती है, नई गाडी ठोक देती है और हृदय रोग लगा देती है.....

एक सुबह का आविष्कार

सुबह कई बार खुद नहीं आती
सुबह कई बार पैदा की जाती
खुद सूरज को धकेल कई बार सूरज को लुडकाया जाता
तभी उसे पहाड़ों से धकेल धकेल किसी तरह सुबह उगाया जाता
चाँद को किसी तरह समझा बुझा कर, तारों को घुट्टी पिलाकर
उन्हे किसी तरह सुलाया जाता
क्यूंकि सुबह कई बार खुद नहीं आती है
सुबह किसी तरह कई आंसू रोने के बाद पैदा की जाती है
आज मैने एक नई सुबह खुद ही बना डाली
खुद ही को हार मैने किसी अपने को जीत दिला ही डाली

Friday, August 27, 2010

दो शब्द 13

ज़िंदगी धुंध है कुहाँसा है ।
मन समन्दर है फिर भी प्यासा है।

दो शब्द12

मैँ मृत्यु सिखाने आया हूँ, जिसको मरना हो आ जाये।
युगधर्म बताने आया हूँ, सूली चढ़ना हो आ जाये॥
हिँसा, प्रतिहिँसा और अहिँसा मेँ अन्तर क्या होता है?
तल, अतल, वितल, ऊपर, नीचे, बाहर, भीतर क्या होता है?
क्या होता है जब फूँक-ताप कर प्रियजन वापस आते हैँ?
दो बूँद ढलकती आँखोँ से फिर दुनिया मेँ रम जाते हैँ।
व्यापार बताने आया हूँ, जिसको लुटना हो आ जाये।
मैँ मृत्यु सिखाने आया हूँ, जिसको मरना हो आ जाये॥
ब्रम्हा के सर्जन और विष्णु के पालन से हटकर शाश्वत।
भीषण, कराल यह रुद्र-धर्म,काली-कंकाली का मरघट।
शोणित,मज्जा और माँस युक्त, नर देह, सुघड़, श्यामल, सुंदर।
वासनायुक्त शुक बैठा है,जिह्वा मेँ राम, कनक पिञ्जर।
झिँझोड़ जगाने आया हूँ, जिसको उठना हो आ जाये।
मैँ मृत्यु सिखाने आया हूँ, जिसको मरना हो आ जाये॥
वह लोक जहाँ अन्याय नहीँ,पाखण्ड नहीँ,छल-छद्म नहीँ।
जो अजर, अमर, चेतन, शाश्वत,होने वाला है भस्म नहीँ।
जो शुद्ध-बुद्ध,कैवल्य धाम, अन्यायी पर है वज्रपात।
जो न्यायी,धर्मात्मा,व्यापक, जो धीर,वीर,अज और उदात।
वह मोक्ष दिलाने आया हूँ, जिसको मिटना हो आ जाये।
मैँ मृत्यु सिखाने आया हूँ, जिसको मरना हो आ जाये॥

Tuesday, August 17, 2010

दो शब्द 11

जिन्दगी ए जिन्दगी
तेरा कोई अतवार नहीं
हर कोई तेरा दम भरता है
मोत से किसी को प्यार नहीं
तुमसे हाथ छुडवा कर
कोई जाये तो कहाँ जाये
तुमे एक बार खो कर
कोई पाए तो कैसे पाए
तुमे बनाने मे कभी कभी
ये उम्र भी पड़ जाती है छोटी
तेरे आकार मे कोई ढले तो कैसे
बड़ी कठिन है तेरी कसोटी
फिर भी सभी को जरुरत है तेरी
क्योकि तेरे बिना ये संसार नहीं
जिन्दगी ए जिन्दगी
तेरा कोई अतवार नहीं

Monday, August 9, 2010

दो शब्द 11

आप गैरो कि बात कर्ते है, हम्ने अप्नो को आज्माया है, लोग कान्टो से बच्कर चल्ते है, हम्ने फूलो से जख्म खाये है…

Sunday, August 8, 2010

दो शब्द 10

जिस जिस को हम्ने चाहा, उन सब ने दिल टोड दिया, टूटा है दिल इत्नी बार कि, दिल ने अब धड्कना हि छोड् दिया।

दो शब्द 9

एक्जाम पास आए, सिर मेरा दु:खाये टिचर ने न जाने क्यु, डन्डे दिखाए, अब तो मेरा सिर, जागे न सोता है, क्या करू हाए, कुछ कुछ होता है…।

Saturday, August 7, 2010

दो शब्द 8

मस्ती आन्खो मे होती है।।शराब मे नहि… भक्ती श्रद्धा मे होती है…शब्दो मे नही।। तु भि जान ले मेरे दोस्त्… दोस्ती दिल मे होती है।। दिखावेमे नहि…

दो शब्द 7

न जाने उश् पेर् इत्ना यकिन क्यु होता है, न जाने उस्का खयाल भि इत्ना हसीन क्यु होता है, सुना है प्यार का दर्द मित्था होता है , तो इस्स आँखा से निक्ला आसुँ नम्कीन क्यु होता है…

Friday, August 6, 2010

दो शब्द 7

चान्द ने कि होगी सुरज से मोहम्बत् इस्लिये तो चान्द मै न दाग है मुम्किन है चान्द से हुइ होगी बेवफाइ इस्लिये तो सुरज मै न आग है

दो शब्द6

फूल जब गुलाब क हो तो कान्तो से क्या दर्ना फूल जब गुलाब का हो तो कन्तो से क्या दर्न स्चूल् जब अप्ने बाप का हो तो तिचर् से क्या दर्ना …

दो शब्द 5

जिसे डिल् डिया वोह दिल्ली चली गयी, जिसे प्यार किया वोह इटली चली गयी, दिल् ने कहाँ खुद खुशी केर् ले जालिम, बिज्ली को हाथ लगाय टो बिज्ली चली गयी।

दो शब्द 4

वो आती तो है पर तन् से नही बाते कर्ती तो है पर मन् से नही कौन् केह्ता है “साहिल्” वो प्यार नही कर्ती वो प्यार कर्ती तो है पर हम से नही

Thursday, August 5, 2010

दो शब्द 3

सर झुकाओगे टो पत्थर देवता हो जाएगा इत्ना मत चाहो उसे वो बेवफ हो जाएगा हम भि डरिय हैन हुमेइन अप्ना हुनर मलूम है जिस टरफ् भि छल परैङे रास्ता हो जाएगा कित्नी सच्चै से मुझ से जिन्दगी ने केह डिया टु नहि न मेरा तो कोइ डूस्रा हो जाएगा मै ना खुद क नाम ले कर पी रहा हू न डोस्तो जेहर भि इस्स मेइ न अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के है न हावा, खुश्बू, जमीन्-ओ-आस्मान मै न जहान भि जाऊङा उश को पता हो जाएगा रूथ जान टो मोहब्बात कि अलामत है मगर क्या खबर थि मुझ से वो इत्ना खफा हो जाएगा

दो शब्द 2

अंअन वाले सम्हाल कर राख्ना कुछ उजाले सम्हाल कर राख्ना जाने कब देश को जरूरत हो कुछ जियाले सम्हाल कर राख्न सच कि तजीम भि जरूरी है मुन्हा के छले सम्हाल कर राख्ना भूख का इम्त्यहाँन होना है कुछ निवाले सम्हाल कर राख्ना बाघा वलोन से जब भि घब्राओ डश्ता वले सम्हाल कर राख्ना

दो शब्द1

अप्ने ख्वबो कि तबिर कि खातिर मेरी चोट सा संसार क्योन उजर दाला याद कर वो दिन एक ईशारा पर मैने भरी मह्फिल मैन तुझे अप्नी दुल्हन बना दाला पर थोदी सि गुर्बाट को देख कर तुम ने मुझे बेइज्जत और बद्नम कर दला मैने हमेशा तुझे प्यार किया है पर तुने खुन के आसुँ रुला दाला टुम्हे रुथा हुँ मह्बुवा सम्झा था मैने पर तुने मुझ से बेवफै कर दला।