अपनी गैरत को हम अब और समझायेंगे नहीं
वफ़ा करते. हैं तो क्या. करते. हैं एहसाँ मुझपर
Tuesday, November 30, 2010
सरिफ आदमी
एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..
दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..
दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..
जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..
वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..
तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..
ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..
बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा “अभी”..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..
एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं.
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..
दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..
दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..
जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..
वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..
तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..
ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..
बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा “अभी”..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..
एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं.
Monday, November 22, 2010
खामोश
आज
जबकि ये तय है
कि हमें बिछड़ जाना है
हमारे और तुम्हारे रास्ते
अलग अलग हो चुके हैं
तो
ये सोचना जरूरी है
कि हम गलत थे
या तुम?
मैं सोचता हूँ
और सोचता चला जाता हूँ...
कहीं मैं तो गलत नहीं था
शायद !
क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते
मुझे लगता है
मैं ही गलत था
मैं ये भी जानता हूँ
कि
तुम भी यही सोच रही हो
कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?
सच मानो-
रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों
पर
न मैं गलत था
और न ही तुम।
फिर ये जुदाई क्यों?
ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है
मेरे जेहन में .
मैं सोचने लगता हूँ...
जमीं आसमां नहीं मिलते
( विज्ञान में यही पढ़ा है
पर विज्ञान कुछ भी कहे )
जमीं आसमां मिलते हैं
एक छोर से मिलते हुए
वे जुदा होते हैं
और
फिर मिल जाते हैं
सच्चाई यही है कि
चारो दिशाओं में
वे एक हैं.
बीच में हम जैसे लोग हैं
जो ये समझते हैं कि
जमीं आसमां एक नहीं हैं.
करोड़ों तारों की तपिश
अपने कलेजे में रखने वाला आसमां
और
अरबों लातों की मार सहने वाली धरती
एक हैं।
फिर हम तुम जुदा कैसे?
हम मिलकर चले थे,
आज जुदा हैं..
पर आगे फिर मिलेंगे।
हाँ !
उसके बाद जुदाई नहीं होगी
क्योंकि
जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है
उतना ही शायद मैंने भी।
और दर्द सीने में दबाये रखने वाले
एक होकर रहते हैं
वो भी ऐसे
जैसे दूर क्षितिज पर
जमीं और आसमां
जहाँ से वे अलग नहीं होते।
मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा
और न ही मिलने को कहूँगा
पर हम फिर मिलेंगे
उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।
हाँ !
ये मिलन खामोश होगा
क्योंकि
जिनके कलेजे में दर्द होता है
उनकी जुबां नहीं हिलती
बिलकुल मेरी तरह....
बिलकुल तुम्हारी तरह.....
जबकि ये तय है
कि हमें बिछड़ जाना है
हमारे और तुम्हारे रास्ते
अलग अलग हो चुके हैं
तो
ये सोचना जरूरी है
कि हम गलत थे
या तुम?
मैं सोचता हूँ
और सोचता चला जाता हूँ...
कहीं मैं तो गलत नहीं था
शायद !
क्योंकि तुम तो गलत हो नहीं सकते
मुझे लगता है
मैं ही गलत था
मैं ये भी जानता हूँ
कि
तुम भी यही सोच रही हो
कि कहीं तुम तो गलत नहीं थी?
सच मानो-
रास्ते आज भले ही अलग-अलग हो गए हों
पर
न मैं गलत था
और न ही तुम।
फिर ये जुदाई क्यों?
ये प्रश्न बार बार कौंध जाता है
मेरे जेहन में .
मैं सोचने लगता हूँ...
जमीं आसमां नहीं मिलते
( विज्ञान में यही पढ़ा है
पर विज्ञान कुछ भी कहे )
जमीं आसमां मिलते हैं
एक छोर से मिलते हुए
वे जुदा होते हैं
और
फिर मिल जाते हैं
सच्चाई यही है कि
चारो दिशाओं में
वे एक हैं.
बीच में हम जैसे लोग हैं
जो ये समझते हैं कि
जमीं आसमां एक नहीं हैं.
करोड़ों तारों की तपिश
अपने कलेजे में रखने वाला आसमां
और
अरबों लातों की मार सहने वाली धरती
एक हैं।
फिर हम तुम जुदा कैसे?
हम मिलकर चले थे,
आज जुदा हैं..
पर आगे फिर मिलेंगे।
हाँ !
उसके बाद जुदाई नहीं होगी
क्योंकि
जितना दर्द तुमने अपने कलेजे में छुपा कर रखा है
उतना ही शायद मैंने भी।
और दर्द सीने में दबाये रखने वाले
एक होकर रहते हैं
वो भी ऐसे
जैसे दूर क्षितिज पर
जमीं और आसमां
जहाँ से वे अलग नहीं होते।
मैं तुम्हें रुकने को नहीं कहूँगा
और न ही मिलने को कहूँगा
पर हम फिर मिलेंगे
उसी ख़ामोशी से जैसे पहले मिले थे।
हाँ !
ये मिलन खामोश होगा
क्योंकि
जिनके कलेजे में दर्द होता है
उनकी जुबां नहीं हिलती
बिलकुल मेरी तरह....
बिलकुल तुम्हारी तरह.....
Sunday, November 21, 2010
मुस्कराना
झुकी नज़रों से उनका मुस्कराना जुल्म ढाता है
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है
हँसीना जो मिली थी आज मुझको एक अनजानी
उसी की एक चितवन के लिए दिल डोल जाता है
बयाँ कैसे करूँ, जाती नहीं सूरत निगाहों से
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है
छिपाए जा रही थी चाँद सा मुखड़ा उरोजों में
नवेली व्याहता का ज्यूँ कोई घूंघट उठाता है
खुदा भी है बड़ा माहिर, बना दीं सूरतें ऐसी
जिन्हें गर देख लो इक बार तो ईमान जाता है
चलो अच्छा हुआ, देखा उसे मैंने फकीरी में
नहीं तो इश्क, पहचाने बिना फाँका कराता है
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है
हँसीना जो मिली थी आज मुझको एक अनजानी
उसी की एक चितवन के लिए दिल डोल जाता है
बयाँ कैसे करूँ, जाती नहीं सूरत निगाहों से
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है
छिपाए जा रही थी चाँद सा मुखड़ा उरोजों में
नवेली व्याहता का ज्यूँ कोई घूंघट उठाता है
खुदा भी है बड़ा माहिर, बना दीं सूरतें ऐसी
जिन्हें गर देख लो इक बार तो ईमान जाता है
चलो अच्छा हुआ, देखा उसे मैंने फकीरी में
नहीं तो इश्क, पहचाने बिना फाँका कराता है
Saturday, November 20, 2010
दो सब्द्३०
आप के खिताब से नवाज़ा क्या तुमने
तल्खी मिजाज़ की हम महसूस कर गए
तुम से आप का सफ़र कितना थकाता है
हम बोल भी न पाए जहाँ थे ठहर गए
गर्दिश में हों सितारे तो होता है यही हाल
राह दिखलाने को अंधा भी नहीं मिलता
अपनों के साथ हँसना तो होता ही है मुहाल
रोने के लिए एक कंधा भी नहीं मिलता
देखता हूँ तो झूठे गुस्से का इज़हार करती हो
नहीं देखूँ तो रुक के मेरा इंतज़ार करती हो
आ के खिड़की पे ही क्यूँ बाल खोलती हो तुम
बिना मुह खोले कितना झूठ बोलती हो तुम
आँसू उनके पोंछो जिनको हँसना आता हो
उसे सुनाओ गीत कभी जो खुद भी गाता हो
नीरस तो मरता रहता है जीना क्या जाने
जियो उसी के साथ जिसे खुद जीना आता हो
पहचान तो लूँगा उन्हें, हों कैसे भी हालात
एक दौर था जब उनके ही पहलू में रहते थे
साथ में गर जीने न पाए तो क्या हुआ
हम साथ साथ मरने की बातें तो करते थे
इक दौर था, इक दूसरे का प्यार मिलता था
हँसते थे साथ साथ तो मिलती थी हर खुशी
अब दौर, कि मरना भी मुश्किल एक दूजे पर
मुमकिन नहीं है, छीन लें एक दूजे कि हँसी
हिन्दू हमी पठान मुसलमान हैं हम सब
पंडित हमी औ तालिब-ए-कुरान हैं हम सब
दुआ करें मंदिर में या सजदा मजार पे
वो एक ही है जिसके तलबगार हैं हम सब
तल्खी मिजाज़ की हम महसूस कर गए
तुम से आप का सफ़र कितना थकाता है
हम बोल भी न पाए जहाँ थे ठहर गए
गर्दिश में हों सितारे तो होता है यही हाल
राह दिखलाने को अंधा भी नहीं मिलता
अपनों के साथ हँसना तो होता ही है मुहाल
रोने के लिए एक कंधा भी नहीं मिलता
देखता हूँ तो झूठे गुस्से का इज़हार करती हो
नहीं देखूँ तो रुक के मेरा इंतज़ार करती हो
आ के खिड़की पे ही क्यूँ बाल खोलती हो तुम
बिना मुह खोले कितना झूठ बोलती हो तुम
आँसू उनके पोंछो जिनको हँसना आता हो
उसे सुनाओ गीत कभी जो खुद भी गाता हो
नीरस तो मरता रहता है जीना क्या जाने
जियो उसी के साथ जिसे खुद जीना आता हो
पहचान तो लूँगा उन्हें, हों कैसे भी हालात
एक दौर था जब उनके ही पहलू में रहते थे
साथ में गर जीने न पाए तो क्या हुआ
हम साथ साथ मरने की बातें तो करते थे
इक दौर था, इक दूसरे का प्यार मिलता था
हँसते थे साथ साथ तो मिलती थी हर खुशी
अब दौर, कि मरना भी मुश्किल एक दूजे पर
मुमकिन नहीं है, छीन लें एक दूजे कि हँसी
हिन्दू हमी पठान मुसलमान हैं हम सब
पंडित हमी औ तालिब-ए-कुरान हैं हम सब
दुआ करें मंदिर में या सजदा मजार पे
वो एक ही है जिसके तलबगार हैं हम सब
Thursday, November 18, 2010
दूरी
मेरे हर इलज़ाम को चुप चाप वो सहती गयी
मुझको माफ़ी दे के वो तो खुद खुदा होती गयी
दूरी अपने दर्मियाँ कुछ इस तरह बढ़ती गयी
रूह मेरी, किश्तों में मुझसे जुदा होती गयी
बंद कर दे मुझपे अपनी आजमाइश ऐ खुदा
मैं तेरे हर इम्तेहाँ में अब तलक अव्वल रहा
खामोशियों की भी जुबान होती है
किसी किसी को ही पहचान होती है
मैं देखता रहा उन्हें पलकों की ओट से
वो मुस्करा दिए तो मेरा हौसला बढ़ा
दर्दे दिल अब बढ़ चुका है हद से भी ज्यादा
इसका धडकना बंद हो तो कुछ सुकून मिले
आती तो है खुशी मेरे चेहरे पे भी मगर
जाती है ज्यूँ मजार से चादर उतार ली
कहाँ छुपा रखा था मासूमियत को अपनी
हम बेवजह फिरते रहे जाने कहाँ कहाँ
तुमसे किया था वादा कि लब न खोलूँगा
वरना तो हर बात का जवाब है, कहो तो दूं
ये मेरी बेहयाई है कि उनकी हद-ए-वफ़ा है
मुझे दीदार कराने को हो जाते हैं बेनकाब
रास्ते बदलते रहना मेरी फितरत में नहीं है
हम तो मंजिल को ही निसाना बना के चलते हैं
खामोशियों को सुनता हूँ, मुझमे है ये हुनर
अँधेरे देख सकता हो तो आ गले लग जा
तुम झूट मेरे बारे में कहना जो कर दो बंद
वादा है सच तुम्हारा किसी से न कहूँगा
बारिश में एक बूँद को तरसता हूँ मैं
धूप पे बनके पसीना बरसता हूँ मैं
चलो करते हैं कोशिश कब तलक खुद को सतायेंगे
उन्ही कि याद में हम रोते रोते सो ही जायेंगे
मेरा ज़मीर मनाने नहीं देता ख़ुशी दिल को
सुना है रहबर-ए-रक़ीब ही नाबीना हो गया
इसे गुरूर मत समझो ये मेरा ऐतबार है
अगर मैं रात को दिन कह दूं तो सूरज निकल आये
अँधेरे में ही गुजरी हो सारी जिन्दगी जिसकी
रौशनी में तो उसकी आँखें चौंधिया ही जायेंगी
ऐसी तरकीब कोई दोस्त बताये मुझको
नींद भर सो लूँ कोई खाब न आये मुझको
आप रहते हो जहाँ, मेरी इबादतगाह है
अब वो मंदिर है कि मस्जिद किसको ये परवाह है
एक खता कभी कभी काबिले दाद होती है
आदम सेब खाता है दुनियाँ आबाद होती है
बुझा सा दिखता है पर एक फूँक मार कर तो देख
राख के नीचे अभी भी सुर्ख अंगार जिन्दा है
मुझे नाकामी का एहसास भी होने नहीं देते
मेरे सपने ही मुझको चैन से सोने नहीं देते
मुझको माफ़ी दे के वो तो खुद खुदा होती गयी
दूरी अपने दर्मियाँ कुछ इस तरह बढ़ती गयी
रूह मेरी, किश्तों में मुझसे जुदा होती गयी
बंद कर दे मुझपे अपनी आजमाइश ऐ खुदा
मैं तेरे हर इम्तेहाँ में अब तलक अव्वल रहा
खामोशियों की भी जुबान होती है
किसी किसी को ही पहचान होती है
मैं देखता रहा उन्हें पलकों की ओट से
वो मुस्करा दिए तो मेरा हौसला बढ़ा
दर्दे दिल अब बढ़ चुका है हद से भी ज्यादा
इसका धडकना बंद हो तो कुछ सुकून मिले
आती तो है खुशी मेरे चेहरे पे भी मगर
जाती है ज्यूँ मजार से चादर उतार ली
कहाँ छुपा रखा था मासूमियत को अपनी
हम बेवजह फिरते रहे जाने कहाँ कहाँ
तुमसे किया था वादा कि लब न खोलूँगा
वरना तो हर बात का जवाब है, कहो तो दूं
ये मेरी बेहयाई है कि उनकी हद-ए-वफ़ा है
मुझे दीदार कराने को हो जाते हैं बेनकाब
रास्ते बदलते रहना मेरी फितरत में नहीं है
हम तो मंजिल को ही निसाना बना के चलते हैं
खामोशियों को सुनता हूँ, मुझमे है ये हुनर
अँधेरे देख सकता हो तो आ गले लग जा
तुम झूट मेरे बारे में कहना जो कर दो बंद
वादा है सच तुम्हारा किसी से न कहूँगा
बारिश में एक बूँद को तरसता हूँ मैं
धूप पे बनके पसीना बरसता हूँ मैं
चलो करते हैं कोशिश कब तलक खुद को सतायेंगे
उन्ही कि याद में हम रोते रोते सो ही जायेंगे
मेरा ज़मीर मनाने नहीं देता ख़ुशी दिल को
सुना है रहबर-ए-रक़ीब ही नाबीना हो गया
इसे गुरूर मत समझो ये मेरा ऐतबार है
अगर मैं रात को दिन कह दूं तो सूरज निकल आये
अँधेरे में ही गुजरी हो सारी जिन्दगी जिसकी
रौशनी में तो उसकी आँखें चौंधिया ही जायेंगी
ऐसी तरकीब कोई दोस्त बताये मुझको
नींद भर सो लूँ कोई खाब न आये मुझको
आप रहते हो जहाँ, मेरी इबादतगाह है
अब वो मंदिर है कि मस्जिद किसको ये परवाह है
एक खता कभी कभी काबिले दाद होती है
आदम सेब खाता है दुनियाँ आबाद होती है
बुझा सा दिखता है पर एक फूँक मार कर तो देख
राख के नीचे अभी भी सुर्ख अंगार जिन्दा है
मुझे नाकामी का एहसास भी होने नहीं देते
मेरे सपने ही मुझको चैन से सोने नहीं देते
Wednesday, November 17, 2010
प्रयोग
क्यों न हम
भौतिकी का एक प्रयोग करें
लोहे को
चुम्बक से रगड़ो
उसमें आ जाता है
चुम्बकीय गुण ...//
हम भी बन जायेगे
चुम्बक
गर चलेगें
महापुरुषों द्वारा बनाई
पदचिन्हों पर ....//
भौतिकी का एक प्रयोग करें
लोहे को
चुम्बक से रगड़ो
उसमें आ जाता है
चुम्बकीय गुण ...//
हम भी बन जायेगे
चुम्बक
गर चलेगें
महापुरुषों द्वारा बनाई
पदचिन्हों पर ....//
Tuesday, November 16, 2010
Monday, November 15, 2010
दो ख़बरें
दो ख़बरें
दो आत्महत्याएँ
एक बिकती रही रात भर
टीवी चैनल्स पर
और फिर सुबह को
परोसी गई
एक मिक्सड डिश के रूप में
अखबारों केपन्नों पर
सुसाइड या हादसा?
करते रहो बहस....
एक असफल प्रेमी
और रईसजादे की मौत को
घरो से बसों,
और फिर दफ़्तरों तक ले जाते लोग
अखबार के कोने में छपी
एक खबर को लांघ कर निकल गये
जिसका बोर सा शीर्षक था
लू लगने से एक रिक्शेवाले की मौत......
पर उसकी पत्नी ही जानती थी
वो एक हादसा नहीं
आत्महत्या थी
आखिर क्यों निकला था
तपती धूप में पेट की आग बुझाने?
दो आत्महत्याएँ
एक बिकती रही रात भर
टीवी चैनल्स पर
और फिर सुबह को
परोसी गई
एक मिक्सड डिश के रूप में
अखबारों केपन्नों पर
सुसाइड या हादसा?
करते रहो बहस....
एक असफल प्रेमी
और रईसजादे की मौत को
घरो से बसों,
और फिर दफ़्तरों तक ले जाते लोग
अखबार के कोने में छपी
एक खबर को लांघ कर निकल गये
जिसका बोर सा शीर्षक था
लू लगने से एक रिक्शेवाले की मौत......
पर उसकी पत्नी ही जानती थी
वो एक हादसा नहीं
आत्महत्या थी
आखिर क्यों निकला था
तपती धूप में पेट की आग बुझाने?
Sunday, November 14, 2010
तुम
दूर रहके ही मुस्कराओगे
या करीब मेरे तुम आओगे
...
फिक्र अपनी नहीं तुम्हारी है
कैसे तुम जिंदगी बिताओगे
जागती आँखों में सोये कोई
नीद में मुझको ही सुलाओगे
मुझको भुलाना है नहीं आसाँ
कैसे इस बात को भुलाओगे
मिरी पुतली जो पलट जायेगी
बारहा मुझको तुम बुलाओगे
करोगे अपने से धोखा कबतक
हकीकत कब तक यूँ छुपाओगे
आ जाओ, तुम जीते मैं हारा
अब तो खुश हो गले लगाओगे
या करीब मेरे तुम आओगे
...
फिक्र अपनी नहीं तुम्हारी है
कैसे तुम जिंदगी बिताओगे
जागती आँखों में सोये कोई
नीद में मुझको ही सुलाओगे
मुझको भुलाना है नहीं आसाँ
कैसे इस बात को भुलाओगे
मिरी पुतली जो पलट जायेगी
बारहा मुझको तुम बुलाओगे
करोगे अपने से धोखा कबतक
हकीकत कब तक यूँ छुपाओगे
आ जाओ, तुम जीते मैं हारा
अब तो खुश हो गले लगाओगे
दोस्ती
कोई भी दोस्त गर नाराज रहे, मुझसे बर्दाश्त क्यूँ नहीं होता
दोस्ती तो हसीं नियामत है, उसको आभास क्यूँ नहीं होता
आज इस स्वार्थ भरी दुनियाँ में, मैं जिंदा हूँ दोस्तों के लिए
दोस्त गर होते नहीं साथ मेरे, मैं दुनियाँ में यूँ नहीं होता
भूल पाता नहीं मैं वो दिन जब अपनों ने भी साथ था छोड़ा
दोस्तों ने संभाला न होता, ज़ीश्त ये बाखुशबू नहीं होता
मेरे बच्चे अनाथ हो जाते, मेरी बीबी भी हो जाती बेवा
दोस्त गर ऐन वक़्त न आते, घर मेरा पुरसुकूं नहीं होता
आज बस इतना ही कहता हूँ, कि दोस्ती सच्ची इबादत है
दोस्तों के बिना इबादत क्या, मेरे हाथों वजू नहीं होता
दोस्ती तो हसीं नियामत है, उसको आभास क्यूँ नहीं होता
आज इस स्वार्थ भरी दुनियाँ में, मैं जिंदा हूँ दोस्तों के लिए
दोस्त गर होते नहीं साथ मेरे, मैं दुनियाँ में यूँ नहीं होता
भूल पाता नहीं मैं वो दिन जब अपनों ने भी साथ था छोड़ा
दोस्तों ने संभाला न होता, ज़ीश्त ये बाखुशबू नहीं होता
मेरे बच्चे अनाथ हो जाते, मेरी बीबी भी हो जाती बेवा
दोस्त गर ऐन वक़्त न आते, घर मेरा पुरसुकूं नहीं होता
आज बस इतना ही कहता हूँ, कि दोस्ती सच्ची इबादत है
दोस्तों के बिना इबादत क्या, मेरे हाथों वजू नहीं होता
पत्थर
सुना है अब की पत्थरों ने बगावत कर दी
फेंकने वालों के गुरूर पे लानत कर दी
लौट के फोड़ दिया सर फिरकापरस्ती का
अमन-ओ-ईमान से रहने की हिदायत कर दी
फेंकने वालों के गुरूर पे लानत कर दी
लौट के फोड़ दिया सर फिरकापरस्ती का
अमन-ओ-ईमान से रहने की हिदायत कर दी
Saturday, November 13, 2010
सब्र तो करो
यूँ रोते नही शामो –सहर , सब्र तो करो
कहती है अभी राहगुज़र सब्र तो करो
दुनिया जो मुक़ाबिल है कहो पूजने लगे
ऐ मेरे जवाँ ज़ख्मे-जिगर सब्र तो करो
धरती में निहाँ सोज़ कोई अब्र बन गया
जब दिल का धुआँ जाये ठहर सब्र तो करो
छालों के कई दाग दिये खैरख्वाह ने
चमकेंगे यही दाग़ मगर सब्र तो करो
जो धूप बिखेरे है वही बख़्श दे कभी
ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव बशर सब्र तो करो
आती है उसे शर्म मिरे साथ आज, पर
कल खुद पे लजायेगी नज़र सब्र तो करो
इक रोज़ मुहब्बत का उसे भी लगेगा रोग
जायेंगे तिरे भाग सँवर सब्र तो करो
इस वज़्ह तुम्हें ज़ख्म दिये जा रहे है, वो
मरहम भी लगायेंगे, मगर सब्र तो करो
मंज़िल के लिये शहर में घूमो न दरबदर
आयेगी वो ज़ीने से उतर सब्र तो करो
आयी न वफ़ा रास हबीबों को “शेष” की
हमराह हैं खुर्शीदो-क़मर सब्र तो करो
कहती है अभी राहगुज़र सब्र तो करो
दुनिया जो मुक़ाबिल है कहो पूजने लगे
ऐ मेरे जवाँ ज़ख्मे-जिगर सब्र तो करो
धरती में निहाँ सोज़ कोई अब्र बन गया
जब दिल का धुआँ जाये ठहर सब्र तो करो
छालों के कई दाग दिये खैरख्वाह ने
चमकेंगे यही दाग़ मगर सब्र तो करो
जो धूप बिखेरे है वही बख़्श दे कभी
ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव बशर सब्र तो करो
आती है उसे शर्म मिरे साथ आज, पर
कल खुद पे लजायेगी नज़र सब्र तो करो
इक रोज़ मुहब्बत का उसे भी लगेगा रोग
जायेंगे तिरे भाग सँवर सब्र तो करो
इस वज़्ह तुम्हें ज़ख्म दिये जा रहे है, वो
मरहम भी लगायेंगे, मगर सब्र तो करो
मंज़िल के लिये शहर में घूमो न दरबदर
आयेगी वो ज़ीने से उतर सब्र तो करो
आयी न वफ़ा रास हबीबों को “शेष” की
हमराह हैं खुर्शीदो-क़मर सब्र तो करो
बिरही
मुझे सताए सजना, जाए प्रीत निगोड़ी जाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
तेरो अंग लगूँ तो लागे हर दिन मोको फाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चले गए परदेस सजनवा, फूट्यो मेरो भाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चाँद सुलगता लागे मोहे, फूल दहकती आग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
हार गले का, पाँव पैजनी लिपटें जैसे नाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
बिन तेरे माथे कि बिंदिया, लगे जले का दाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चाहे कितना सज लूँ साजन, सूनी रहती माँग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
मुझे सताए सजना, जाए प्रीत निगोड़ी जाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
तेरो अंग लगूँ तो लागे हर दिन मोको फाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चले गए परदेस सजनवा, फूट्यो मेरो भाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चाँद सुलगता लागे मोहे, फूल दहकती आग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
हार गले का, पाँव पैजनी लिपटें जैसे नाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
बिन तेरे माथे कि बिंदिया, लगे जले का दाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
चाहे कितना सज लूँ साजन, सूनी रहती माँग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग
उम्मीद
हो जैसा भी नसीब मगर दिन तो कटेगा ही
भूख मिटाने को मुफलिस दिन रात खटेगा ही
ओ चश्मेतर, मुश्किल नहीं है मंजिले-हयात
कदम तो बढ़ाते रहो, रस्ता ये कटेगा ही
हमने भी देख लिया है वाइज का मोजीजा
होगी जो रूह रोशन तो अँधेरा छंटेगा ही
तुम कदम तो बढाओ, कुछ हौसला दिखाओ
तजाहुल है, मगर मुश्किल में साथ डटेगा ही
देगा वो मांगने से ही, बनना न खरीदार
मौला बड़ा ताजिर है वो तुझको जटेगा ही
जिससे भी मिलना सोचके समझ के ही मिलना
कांटो से दोस्ती में दामन तो फटेगा ही
भूल जा तू दुश्मनी सबको लगाता जा गले
भूख मिटाने को मुफलिस दिन रात खटेगा ही
ओ चश्मेतर, मुश्किल नहीं है मंजिले-हयात
कदम तो बढ़ाते रहो, रस्ता ये कटेगा ही
हमने भी देख लिया है वाइज का मोजीजा
होगी जो रूह रोशन तो अँधेरा छंटेगा ही
तुम कदम तो बढाओ, कुछ हौसला दिखाओ
तजाहुल है, मगर मुश्किल में साथ डटेगा ही
देगा वो मांगने से ही, बनना न खरीदार
मौला बड़ा ताजिर है वो तुझको जटेगा ही
जिससे भी मिलना सोचके समझ के ही मिलना
कांटो से दोस्ती में दामन तो फटेगा ही
भूल जा तू दुश्मनी सबको लगाता जा गले
Friday, November 12, 2010
दो शब्द २8
इतनी मोहब्बत है मेरे दिल में आपके लिये
कि यह कभी कम न हो पायेगी
जिस दिन जायेंगे इस दुनिया से
उस दिन मौत भी आंसूं बहायेगी
कि यह कभी कम न हो पायेगी
जिस दिन जायेंगे इस दुनिया से
उस दिन मौत भी आंसूं बहायेगी
दो शब्द २७
मैंने कई बार चांद की लौ में उसे देखा है, किसी टहनी पर उगने वाले पहले पत्ते में नदी के पानी में तैरते हुए मन्दिर के कलश में... अगर वह सचमुच मर गया होता—तो मेरी आँखों में यह पानी नहीं आ सकता था...
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