दो शब्द
मन कि भाबनाय उज्गार कर रहा हुँ आसा है कि आप को भि पसन्द आएगा...
Sunday, November 21, 2010
सिन्दूर
भरते क्यूँ नहीं सिन्दूर अपने नाम का बढ़ केतुम्हारे. आस. पास. घूमती खुशियाँ कुँवारी हैं
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