Sunday, September 5, 2010

दो शब्द 25

इक रोज़ खुदा ने
इंद्रधनुष के रंगो को
एक शीशी में बंद किया...
उस शीशी को
हल्का हिला के
एक कैनवस पे
उड़ेल दिया..
उस कैनवस पे
मेरी तस्वीर उभरी थी...

वो तस्वीर बना के
'खुदा' सोने को गये
फ़रिश्तो ने,शाम ढले
उसपे कुछ..ख़ुश्बू डाली..
ढलते सूरज की
रोशनी छिड़की...
....
आधी रात में
शैतान ने
वो तस्वीर चुरा ली...
...पर वो तो
आम सी तस्वीर दिखती थी
..
अब चुरा ली
तो क्या करता..
दो रोज़
अपने पास रखी,
फिर उभ के
मिट्टी में
दफ़ना दी..
सदियों-सदियों
वो दफ़न रही...
एक रोज़
फ़रिस्ते मिट्टी में
खेल रहे थे..
उनको वो तस्वीर मिली
...अपनी ग़लती छुपाने
फ़रिस्तों ने
जल्दी-जल्दी
आडी-तिरछी सी
किस्मत लिख..
मुझको धरती पर
फेक दिया...

मैं तबसे
धरती पर हूँ
उन रंगो की
तलाश में हूँ...

कुछ रंग मिले है
कुछ ख़ुश्बू भी...
आप "फ़ुरसत" मे है
तब ही आए..
समझे मैं कौन हूँ...
क्या-क्या ख़ुद में
समेटे हूँ..

मैं कौन हूँ..?
अब तक तलाश ये जारी है...

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