Tuesday, August 31, 2010

दस क्षणिकाएँ

वार

पीठ पीछे का वार

तोड़ देता है

परिवार





जीवन मंथन

मुमकिन है गोते लगाना

मुश्किल है सीप से मोती लाना

ये जीवन मंथन है





दौर

जो दौर गुजर रहा है

हमारे आसपास से

डरने लगे हैं

अपने अहसास से





भ्रष्टाचार

कलियुग में भ्रष्टाचार

खड़ा है बाँह फैलाए

जीवन का यह चक्र

फिर भी घूमता जाए





शून्य

धीरे धीरे बारी बारी

रूठे मुझसे सब

शून्य को निहारता हूँ

रोता नहीं हूँ अब





कोशिश

एक टुकड़ा धूप ही सही

कभी तो मिलेगी

कोशिश करना ही जिंदगी है



कदम

आगे कुआँ पीछे खाई है

यहाँ किसने निभाई है

संभल कर रखो कदम

इसी में भलाई है





हिम्मत

काले घुप्प अंधेरे में

रौशनी की एक नन्हीं लकीर

देती है अँधियारा चीर

हिम्मत से





ग़ज़ल

आहों वेदनाओं से जब

नयन हुए सजल

कभी गीत कभी मुखड़ा

कभी बन गई गजल



१०

सत्कर्म

जिंदगी एक फूल है

जो महकती है

चहकती है

अपने सत्कर्मों से

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