Tuesday, August 31, 2010

मंदिर और मदिरालय

मंदिर और मदिरालय में है कौन बेहतर



ये सवाल एक छोटे बच्चे से पूछा ।



उससे,जो एक शराबखाने के बाहर,



बेचता है बर्फ हर शाम ।



कमर से बांधे रखता है प्लास्टिक का ग्लास



हाथों में एक मग और माचिस ।



पांच रूपये में रच देता है,जो



बार,खुले आसमां के नीचे ।



इसके बदले उसे मिलता है



चंद पैसे और शराब की खाली बोतलें



मुनाफे का सौदा है ये ।



ये जगह मुफिद है उसके लिये



धूल भरी गर्म शामों में भी ।



पर उसे बहुत मतलब नहीं



पास एक मंदिर से ।



उसे बस इतना मालूम है



कि,भगवान रहते हैं यहां ।



हजारों लोग आते हैं,



कुछ ना कुछ मांगने,



नई गाड़ी की पूजा कराने,



तो अच्छी नौकरी मांगने,



लेकिन इससे उसे क्या



रोटी तो नहीं मिल पाती यहां ।



प्रसाद भी लोग बड़ी दुकानों से खरीद लाते हैं



फूल बेचने के लायक पूंजी नहीं उसके पास ।



मंदिर से मिले प्रसाद के बाद भी,



भूख लगी रहती है उसे ।



लिहाजा मदिरालय ही,



बेहतर है उसके लिये ।



यहां वो शान से रहता है



क्योंकि उसे किसी से कुछ मांगना नहीं पड़ता ।

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