Thursday, November 18, 2010

दूरी

मेरे हर इलज़ाम को चुप चाप वो सहती गयी
मुझको माफ़ी दे के वो तो खुद खुदा होती गयी

दूरी अपने दर्मियाँ कुछ इस तरह बढ़ती गयी
रूह मेरी, किश्तों में मुझसे जुदा होती गयी

बंद कर दे मुझपे अपनी आजमाइश ऐ खुदा
मैं तेरे हर इम्तेहाँ में अब तलक अव्वल रहा

खामोशियों की भी जुबान होती है
किसी किसी को ही पहचान होती है

मैं देखता रहा उन्हें पलकों की ओट से
वो मुस्करा दिए तो मेरा हौसला बढ़ा

दर्दे दिल अब बढ़ चुका है हद से भी ज्यादा
इसका धडकना बंद हो तो कुछ सुकून मिले

आती तो है खुशी मेरे चेहरे पे भी मगर
जाती है ज्यूँ मजार से चादर उतार ली

कहाँ छुपा रखा था मासूमियत को अपनी
हम बेवजह फिरते रहे जाने कहाँ कहाँ

तुमसे किया था वादा कि लब न खोलूँगा
वरना तो हर बात का जवाब है, कहो तो दूं

ये मेरी बेहयाई है कि उनकी हद-ए-वफ़ा है
मुझे दीदार कराने को हो जाते हैं बेनकाब

रास्ते बदलते रहना मेरी फितरत में नहीं है
हम तो मंजिल को ही निसाना बना के चलते हैं

खामोशियों को सुनता हूँ, मुझमे है ये हुनर
अँधेरे देख सकता हो तो आ गले लग जा

तुम झूट मेरे बारे में कहना जो कर दो बंद
वादा है सच तुम्हारा किसी से न कहूँगा

बारिश में एक बूँद को तरसता हूँ मैं
धूप पे बनके पसीना बरसता हूँ मैं

चलो करते हैं कोशिश कब तलक खुद को सतायेंगे
उन्ही कि याद में हम रोते रोते सो ही जायेंगे

मेरा ज़मीर मनाने नहीं देता ख़ुशी दिल को
सुना है रहबर-ए-रक़ीब ही नाबीना हो गया

इसे गुरूर मत समझो ये मेरा ऐतबार है
अगर मैं रात को दिन कह दूं तो सूरज निकल आये

अँधेरे में ही गुजरी हो सारी जिन्दगी जिसकी
रौशनी में तो उसकी आँखें चौंधिया ही जायेंगी

ऐसी तरकीब कोई दोस्त बताये मुझको
नींद भर सो लूँ कोई खाब न आये मुझको

आप रहते हो जहाँ, मेरी इबादतगाह है
अब वो मंदिर है कि मस्जिद किसको ये परवाह है

एक खता कभी कभी काबिले दाद होती है
आदम सेब खाता है दुनियाँ आबाद होती है

बुझा सा दिखता है पर एक फूँक मार कर तो देख
राख के नीचे अभी भी सुर्ख अंगार जिन्दा है


मुझे नाकामी का एहसास भी होने नहीं देते
मेरे सपने ही मुझको चैन से सोने नहीं देते

1 comment:

  1. ये सारे शेर मेरे हैं भाई जी, कम से कम नाम तो दे दिया होता.

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