Friday, November 12, 2010

दो शब्द २७

मैंने कई बार चांद की लौ में उसे देखा है, किसी टहनी पर उगने वाले पहले पत्ते में नदी के पानी में तैरते हुए मन्दिर के कलश में... अगर वह सचमुच मर गया होता—तो मेरी आँखों में यह पानी नहीं आ सकता था...

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