आप के खिताब से नवाज़ा क्या तुमने
तल्खी मिजाज़ की हम महसूस कर गए
तुम से आप का सफ़र कितना थकाता है
हम बोल भी न पाए जहाँ थे ठहर गए
गर्दिश में हों सितारे तो होता है यही हाल
राह दिखलाने को अंधा भी नहीं मिलता
अपनों के साथ हँसना तो होता ही है मुहाल
रोने के लिए एक कंधा भी नहीं मिलता
देखता हूँ तो झूठे गुस्से का इज़हार करती हो
नहीं देखूँ तो रुक के मेरा इंतज़ार करती हो
आ के खिड़की पे ही क्यूँ बाल खोलती हो तुम
बिना मुह खोले कितना झूठ बोलती हो तुम
आँसू उनके पोंछो जिनको हँसना आता हो
उसे सुनाओ गीत कभी जो खुद भी गाता हो
नीरस तो मरता रहता है जीना क्या जाने
जियो उसी के साथ जिसे खुद जीना आता हो
पहचान तो लूँगा उन्हें, हों कैसे भी हालात
एक दौर था जब उनके ही पहलू में रहते थे
साथ में गर जीने न पाए तो क्या हुआ
हम साथ साथ मरने की बातें तो करते थे
इक दौर था, इक दूसरे का प्यार मिलता था
हँसते थे साथ साथ तो मिलती थी हर खुशी
अब दौर, कि मरना भी मुश्किल एक दूजे पर
मुमकिन नहीं है, छीन लें एक दूजे कि हँसी
हिन्दू हमी पठान मुसलमान हैं हम सब
पंडित हमी औ तालिब-ए-कुरान हैं हम सब
दुआ करें मंदिर में या सजदा मजार पे
वो एक ही है जिसके तलबगार हैं हम सब
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