Saturday, November 13, 2010

सब्र तो करो

यूँ रोते नही शामो –सहर , सब्र तो करो
कहती है अभी राहगुज़र सब्र तो करो

दुनिया जो मुक़ाबिल है कहो पूजने लगे
ऐ मेरे जवाँ ज़ख्मे-जिगर सब्र तो करो

धरती में निहाँ सोज़ कोई अब्र बन गया
जब दिल का धुआँ जाये ठहर सब्र तो करो

छालों के कई दाग दिये खैरख्वाह ने
चमकेंगे यही दाग़ मगर सब्र तो करो

जो धूप बिखेरे है वही बख़्श दे कभी
ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव बशर सब्र तो करो

आती है उसे शर्म मिरे साथ आज, पर
कल खुद पे लजायेगी नज़र सब्र तो करो

इक रोज़ मुहब्बत का उसे भी लगेगा रोग
जायेंगे तिरे भाग सँवर सब्र तो करो

इस वज़्ह तुम्हें ज़ख्म दिये जा रहे है, वो
मरहम भी लगायेंगे, मगर सब्र तो करो

मंज़िल के लिये शहर में घूमो न दरबदर
आयेगी वो ज़ीने से उतर सब्र तो करो

आयी न वफ़ा रास हबीबों को “शेष” की
हमराह हैं खुर्शीदो-क़मर सब्र तो करो

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